जब से लिखना सीखा बस लिखने का सोचता रहा, लिखा कुछ भी नहीं। कुछ लोग है जो कहते है के मै शायद अच्छा लिखा सकता हु बस कोशिश कर रहा हु पता नहीं हो पाएगा या नहीं। हो गया तो कोशिश सफल हो जायेगी, नहीं हुआ तो फिर से कोशिश करूँगा। लिखने को बहुत कुछ है मेरे पास। कलम से न सही कीबोर्ड से उंगलियो की मुलाकात हो चुकी है। कुछ तो निकलेगा।
जब मै छोटा था तो मेरे नाना जिंदा थे वो एक स्वतंत्र सेनानी थे पर मेरी नानी हमेशा कहती थे के जब अँगरेज़ हिंदुस्तान पर राज करते थे तो ज़िन्दगी बहुत अच्छी थे मै कभी समझ नहीं पाया। हमेशा सोचता था के शायद नानी को नाना से प्यार नहीं है इसलिए शायद ये कहती है कुछ बड़ा हुआ तो दुसरे बच्चो की तरह स्कूल मै पड़ने गया लेकिन अब ज़िदगी के कम से कम २५ साल गुजरने के बाद पता चला के जिस सिस्टम से हम को पढाया जा रहा है वो तो अंगरेजों ने बनाया है। आप को जान के शायद हैरानी हो के लोर्ड मेकाले ने हमारे बारे मै २ फरवरी 1835 को ब्रिटेन के संसद मे क्या कहा पदिये "मैं भारत की लंबाई और चौड़ाई भर में यात्रा की है और मैंने एक भी व्यक्ति जो भिखारी है, जो चोर है नहीं देखा है। ऐसा धन मैंने इस देश में देखा है, ऐसे ऊंचे नैतिक मूल्यों, ऐसे लोगों की बुद्धि का विस्तार, कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी भी इस देश को जीत पायेगे। जब तक हम इस देश की रीढ़ की हड्डी तोड़े जो है उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत। इसलिए है, मेरा प्रस्ताव है कि हम पुरानी और प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को अपनी शिक्षा से बदल दे। अगर भारतीयों को लगता है कि यह सब विदेशी और अंग्रेजी अच्छी है और उनकी संस्कृति से बड़ी है तो वे खो देंगे अपने आत्म सम्मान, मूल संस्कृति को और वे बन जाएगा जो हम उन्हें चाहते हैं, वास्तव में एक गुलाम राष्ट्र।" कितना सही और समझदार व्यक्ति था लोर्ड मेकाले और हम कितने नासमझ आज भी। हम स्कूल जाते है इसलिए के हम बड़े होकर इंजिनियर बने, डॉक्टर बने, कलेक्टर बने और पता नहीं क्या क्या नहीं बनते तो इन्सान। ६२ सालो से हम शायद ये भी नहीं समझ पाए के हम आजाद नहीं हो पाए अभी। वही पुरानी शिक्षाये हमे आज की सर्कार का गुलाम बना देती है। हम खुश है के नौकरी मिल गयी, घर बार और रिश्तेदर बस पूरी ज़िन्दगी निकल देते है लोगो की मर्ज़ी से जीने मे। पर मे शायद ये नहीं कर पर रहा हो। मेरे अब्बा परेशां है के मे कब तक अपनी ज़िन्दगी के साथ प्रयोग करता रहूँगा। कभी पत्रकार, कभी अध्यापक, कभी वकील, कभी मानव अधिकार कार्यकर्त्ता, और ना जाने क्या क्या। काश वो समझ सकते के मै इन्सान बनना चाहता हु। लकिन बहुत मुश्किल है इन्सान होना। हम और हमारा देश मर रहा है और हमें पता भी नहीं। क्यों की शायद हम ही मर गए है। मेरी नानी बिलकुल ठीक है। अँगरेज़ ही अच्छे है कम से कम जब ज़ुल्म हो तो सोच लोअपने नहीं है ज़ुल्म करने वाले। और वैसे भी क्या बदला सिवाए खाल के रंग के और जुबान के और सोचने के. हम और हमारी सरकार आज भी गरीब और इन्सान की दुश्मन है। घूम कर देखो हिंदुस्तान के लम्बाई और मे चौड़ाई मे सिवाए भिखारी, चोर, और गरीब हिंदुस्तान के कुछ नहीं मिलेगा। संस्कृति और विरासत तो अँगरेज़ ले गए १९४७ मे।
शनिवार, 2 जनवरी 2010
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जवाब देंहटाएंnice try :) Chetan Bhagat also wrote something like this in his Ist attempt.... though i m not completely agree with the content..
जवाब देंहटाएंNot Bad...
जवाब देंहटाएंKD
great sir.....really
जवाब देंहटाएंमेकाले द्वारा भारत के हिन्दू-मुसलमानों पर पाश्चात्य शिक्षा-व्यवस्था-जिसमें दावा किया गया था कि एक भी मूर्ति पूजक या नमाजी ऐसा नहीं बचेगा जो मन्दिर या मस्जिद में जाना चाहे। किन्तु उपर वाले को यह मंजूर नहीं था, इसीलिये मेकाले द्वारा दिए शिक्षा व्यवस्था के मात्र एक ही वर्ष बाद, 18 फरवरी 1836 ई0 में बंगाल के गाँव में एक बच्चे का जन्म होता है, जिसका नाम था गदाधर ! और अपने जीवन को ही वेद-मूर्ति बना कर मनुष्यों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया, जिसे पढ़ कर मनुष्य आसानी से समझ सकता है कि 'शिक्षा' किसे कहते हैं, और यथार्थ शिक्षित मनुष्य कैसा बन जाता है! वे जिस श्रेणी के छात्र थे, उसी श्रेणी के शिक्षक भी थे। शिक्षा पूरी कर लेने के बाद उन्होंने 'शिक्षक ' का कार्य-भार ग्रहण किया।
हटाएंकच्ची मिट्टी से कुम्हार जिस प्रकार विभिन्न रूपों की मूर्तियों को गढ़ता है, ठीक उसी प्रकार अल्पव्यस्क तरुणों के जीवन-गठन के कार्य का दायित्व अपने हाथों में लेकर धीरे धीरे उनको विलक्षण रूप और आकार में ढाल दिया। एक सारदामणि, एक विवेकानन्द गढ़ देना ही, समग्र शिक्षा-जगत के इतिहास का अतुलनीय आदर्श बना रहेगा। जिसने एक साथ दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में जीवंत काली की ही पूजा नहीं की बल्कि हिन्दू परिवार में जन्म लेकर भी ६ महीने तक इस्लाम धर्म की साधना भी की, लूँगी पहना और नमाजें पढ़ते रहे। तथा अपने अनुभव के आधार पर कहा-जिंतने मत उतने पथ ! (जो आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण के नाम से प्रसिद्ध हुए।)
वे जब पाठशाला गए, तो कहते हैं, यह शिक्षा मैं नहीं लूँगा। भारतवर्ष के शिक्षा के इतिहास में, सही रूप से सर्वप्रथम छात्र-असन्तोष की शुरुआत यहीं से होती है। छात्र-असन्तोष के हजारों कारणों में से मुख्य कारण यही है कि छात्रों को 'शिक्षा' नहीं मिलती है। इस तथ्य को मेकाले के समय में ही, अर्थात उन्नीसवीं शताब्दी में ही गदाधर ने दिखला दिया कि कि शिक्षा के नाम पर अंग्रेजों के द्वारा जो परोसा जा रहा है, उसमें थोड़ी भी 'शिक्षा' नहीं है, साथ ही साथ यह भी दिखला दिया कि मूर्ति-पूजा किसे कहते हैं। मूलतः शिक्षा एक प्रकार की द्वैत-प्रणाली है। इसमें शिक्षक का व्यक्तित्व ही छात्रों के व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायक होता है। इसिलिये शिक्षा व्यवस्था के संचालन में सबसे मूल्यवान उपकरण शिक्षक हैं।
किन्तु सम्पूर्ण शिक्षा रूपी महान-नाटक में नायक की भूमिका में शिक्षक नहीं छात्र हैं। शिक्षा-जगत के केन्द्र-बिन्दु छात्र ही हैं। किन्तु जो लोग इस शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं, वे इस महान सत्य को अक्सर भूल जाते हैं। यह समग्र शिक्षा-कार्यक्रम ही अपने आप में एक विशाल सार्वजनिक महापूजा है।छात्र इस पूजा के प्रतिमा है। शिक्षक पूजक है। छात्रों के हृदय को स्पर्श कर सके शिक्षक ऐसे मधुर स्वर, में इस प्रकार मंत्रोच्चार करेंगे -" हे मनुष्य-रूपी देवता, इहागच्छ, इहगच्छ, - यहाँ आओ, यहाँ आओ। इह तिष्ठः, इहातिष्ठः - यहाँ रहो, यहाँ रहो। अत्र-अधिष्ठानं-कुरु, यहीं पर वास करो, मम पूजा गृहान -मेरी पूजा ग्रहण करो। "