शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

आज भी मत जगाओ

आपने चीजों को बिकते हुए देखा होगा खुले बाजारों में।
शायद ही कभी देखा हो जिस्म को बिकते हुए हवस के गलियारों में।।
अँधेरी सियाह रातो में गली के आखरी छोर पर।
एक जिस्म जुम्बिश लेता है चन्द सिक्को के जोर पर॥
अहसास है ही नहीं आपको, गरीबी और भूख कैसे सताती है
किसी की बेटी, बहन किसी की और माँ भी बिक जाती है।
और जो ना चाहे उसको भी बेच दिया जाता है।
हिस्सा थाने का हो तो कानून कब आड़े आता है॥
भूख, गरीबी और मुफलिसी दिखती नहीं काले शीशो से।
किसको फुर्सत है बाहर आये सरकारी गलीचों से॥
कानून काम न करे तो अदालत जाओ।
सालो से सोये है हम आज भी मत जगाओ॥
आंख खुल जाएगी, रो दोगे, मरते नज़र आओगे।
किसी रोज़ जो खरीद में बेटी को सामान पाओगे॥
(इमरान अली)

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