रविवार, 3 जनवरी 2010

शाबाश पुलिस, लाजवाब पुलिस, बेपरवाह पुलिस, बेजवाब पुलिस

कल का दिन हिंदुस्तान की पुलिस के लिए शर्मिंदगी भरा रहा। वैसे तो रोज़ ही हमे अपनी पुलिस के काम करने के तरीके पर शर्म आती ही हे। लेकिन कल के दिन पुलिस को ले कर चार बड़ी खबरे रही। एक- तीन पाकिस्तानी आतंकवादी गुप्तचर ब्यूरो के एक इंस्पेक्टर को बेवकूफ बनाकर फरार हो गए। दो- छोटा राजन के गुर्गे की क्रिसमस पार्टी में मेहमान बनने की वजह से मुंबई पुलिस के पांच पुलिसवाले सस्पेंड हो गए। तीन-नॉएडा पुलिस ने एक नामी बदमाश को एन्कोउन्टर में मार गिराया जबकि उस का एक साथी भागने में कामयाब रहा। चार- पश्चिमी मिदनापुर में पुलिस वालो ने तीन लोगो को गोली मर दी, तीनो की मौत हो गई। इनमे से तीन खबरे तो राष्टीय मीडिया में खूब रही। एक दो जगह मिदनापुर की खबर भी थी। मै चारो घटनाओ पर विचार करना चाहता हु।
सबसे पहले तीन आतंकवादियो के फरार होने की खबर लेते ही। कमाल की बात हे के वो आतंकवादी फरार हो गए जिनको एक दो हफ्ते में छोड़ा जाना था। तीनो लाल किला बम्ब धमाके में पांच साल की सजा पूरी कर चुके थे। तीनो को जल्दी ही पाकिस्तान को सौपा जाना था। पर इस से भी कमाल की बात ये हे के गुप्तचर ब्यूरो का जो इंस्पेक्टर उन तीनो को ले कर अस्पताल गया था उसने देर रात तक न तो ये बात अपने बड़े अफसरों को बताई न ही पुलिस को खबर की। किसी तरह मीडिया को इस बात की खबर लगी तो हंगामा होना शुरू हुआ। दिल्ली पुलिस ने तो फ़ौरन हाथ पीछे खीच लिया। और टीवी वालो को खबर मिल गई "दिल्ली वालो सावधान आज रात आप को अपना निशाना बना सकते ही तीन आतंकवादी।" लेकिन मेरा विचार थोडा अलग ही। मै अभी तक ये नहीं समझ पाया के आखिर वो तीन लोग जिन को आज़ादी मिलने ही वाली ही भला क्यों भाग गए। इसके मुझे तीन कारन समझ आते हे। एक- चूँकि उनकी सजा पूरी हो चुकी थे और उनको पाकिस्तान भेजा जाने वाला था और शायद वो अपने घर वापिस नहीं जाना चाहते होंगे। लेकिन इसकी संभावना कम ही हे क्यों की उन्होंने तो बम्ब फोड़ ही दिया था और वो तो पाकिस्तान के लिए हीरो थे। और हीरो अपने देश न जाना चाहे ऐसा कभी हुआ नहीं। दो- हो सकता हे के वो अस्पताल लाये ही न गए हो और पहले ही किसी फर्जी एन्कोउन्टर मै मर दिए गए हो। शायद अब जब उन की सजा पूरी हो गयी हो तो उनके पाकिस्तानी रिश्तेदार उन्हें लेने को तैयार हो। और मरे को जिंदा करना तो किसी के बाद की बात नहीं तो उनको फरार दिखा दो। भाग गए तो लाये कहा से। तीन- चुकी २६ जनवरी आ रही है तो राष्ट सुरक्षा के नाम पर उनका जल्दी कही एनकाउंटर कर दिया जाए। और फिर लोगो को समझे देर नहीं लगेगी के पाकिस्तान आतंकवाद को अभी भी बढ़ावा दे रहा है। बढ़ते आतंकवाद से पुलिस और गुप्तचर एजंसी को और ज्यादा महत्त्व और फंड मिलेगा। बहादुर एनकाउंटर के बदले शायद राष्ट्रीय पुरस्कार। और अगर मै बिलकुल गलत हु तो ये बहुत शर्मिंदगी की बात है के कोई गुप्तचर ब्यूरो को चकमा दे कर निकल जाये। अगर ऐसा है शायद हम गलत लोगो पर भरोसा कर रहे है। दूसरी बात जो मुझे समझ नहीं आरही वो ये के जब किसी को भी सजा हो जाती है तो वो जेल मै रहता है तो कैसे ये तीन आतंकवादी गुप्तचर ब्यूरो के पास थे। शायद जल्दी हमें इस का जवाब मिलेगा। मुझे उम्मीद है।
अब दूसरी खबर के खबर लेते है। एक उपपुलिस अधीक्षक, एक सहायक पुलिस अधीक्षक, एक सीनिअर इन्स्पेक्टर, एक इन्स्पेक्टर और एक हवालदार किसी कैमरे नाचते गाते कैद हो गए। नाचना गाना वो भी क्रिसमस की पार्टी मै मुझे नहीं लगता को बुरी बात है ना ही कैमरे मे कैद होना। लेकिन हुआ ये के ये पार्टी छोटा राजन के किसी गुर्गे ने दी थे। पर छोटा राजन तो हिन्दुस्तानी है और राष्ट भक्त भी क्यों की उसने तो दवूद इब्राहीम से पंगा ले रखा है। श्रीमान इब्राहीम पूरी दुनिया मे अगर किसी से डरते है तो छोटा राजन से। तो मै ये नहीं समझ पर रहा के इन पुलिसवालों ने ऐसा क्या गुनाह किया के एक राष्ट भक्त की पार्टी मै शामिल होने नाचने गाने की वजह से आप को सस्पेंड कर दिया जाये। मुझे लगता है की बीजेपी को इस को मुद्दा बनान चाहिए। लेकिन इस खबर का एक दूसरा पहलु भी है। साफ़ दिखता हे गुंडे और वर्दीवाले गुंडे का याराना। ये याराना हम नहीं छोड़ेगे।
तीसरी खबर नॉएडा से है। पुलिस ने नामी बदमाश सलीम को मार गिराया लेकिन अफ़सोस उसपुरे एक साथी भागने मै कामयाब रहा। और कमाल ये की एक AK-47 जो उस के पास थी उसने उस से पुलिस पर फायर करना उचित नहीं समझा। बेचारा पुलिस की इज्ज़त के रखवाली करता मर गया। मै जो नहीं समझ पाया वो ये के कैसे हमेशा पुलिस बदमाश को आसानी से मर लेती है और बदमाश अपनी बदूक भी इस्तेमाल नहीं कर पता। हमेशा एनकाउंटर सुबह सवेरे ही को होते है। बदमाश शायद सुबह जल्दी उठ कर योग करते होंगे या फिर बेचारे जोगिंग करते होंगे। दिन के उजाले मै कैसे एक मारा जाता है और एक भाग भी जाता है। और एक और कमाल है बदमाश को हमेशा अपनी जान से ज्यादा अपनी गाड़ी की फिकर रहती है। गाड़ी पर कोई निशान नहीं। बढ़िया है झूट ही सही पर ग़ालिब दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है। एक बदमाश तो कम हुआ।
चौथा मामला ज़रा गंभीर है। पुलिस ने पश्चिमी मिदनापुर मे तीन लोगो को गोली मार दी। पुलिस का कहना है के वो नक्सली थे। और लोगो का कहना है के वो शांतिपूर्वक एक जल्लुस निकाल रहे थे। मैं उस पुरे इलाके को अच्छी तरह जनता हु। मै गया था लालगढ़, वो जगह जहा नक्सलियो ने कब्ज़ा कर लिया था। पर मैने जो देखा वो बिलकुल अलग था उस से जो हमारे अख़बार और टीवी वाले दिखा रहे थे। सारे स्कूल बंद थे स्कूल मै पढने वाले बच्चो की जगह पुलिस रहती थी। हमारी कलकत्ता यूनिट ने एक PIL करा कर स्कूल खाली करवाए है। लालगढ़ मिदनापुर का एक छोटा सा क़स्बा है। सीधे सादे आदिवासी लोग, कच्चे घर, दो चार सरकारी दफ्तर और एक अकेली सड़क पर मै यहाँ ये बताना ज़रूरी समझता हु के लालगढ़ की घटना क्यों होई। हुआ ये के बंगाल की सरकार इन आदिवासियो की ज़मीन जिंदल को फेक्टरी लगाने के लिए देना चाहती थे। जब इन लोगो ने इस का विरोध किया तो सरकार ने लोगो को नक्सली बताना शुरू कर दिया और जब बंगाल के मुख्यमंत्री जिंदल के कारखाने का शिलानियास करके वापिस रहे थे तो वह एक माइन ब्लास्ट हुआ। पुलिसने लालगढ़ जा कर लोगो को घरो से निकल कर मारा और औरतो के साथ बत्तमीजी की। आदिवासियो ने मांग की के पुलिस के जिन लोगो ने उनकी औरतो से बुरा बर्ताव किया ही वो यहाँ कर माफ़ी मांगे। पुलिस भला कब माफ़ी मांग सकती है। तो ये आदिवासी नक्सली हो गए। पूरा लालगढ़ आज भी पुलिस और पुलिस के अतियाचार का शिकार हैअगर ये सब जारी रहा तो सचमुच लोग नक्सली बनने पर मजबूर हो जायेगे और हमेशा की तरह पुलिस ही इस की ज़िम्मेदार होगी, पर ज़िम्मेदारी लेगी नहीं। क्यों की ज़िम्मेदारी लेना उस का काम नहीं, पुलिस का काम है कानून के नाम पर अपनी रोटी सेकना और आप को सताना। कब जागेगे हम और कब कहेगे हमे ये पुलिस नहीं चाहिए। ६२ सालो में मैं, आप और सब बेशर्म हो गए ही। जब तक हम नहीं सताए जायेगे। हम नहीं बोलेगे। लेकिन बोलना तो पड़ेगा ही क्यों की अगला नंबर आप का ही तो है

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