हर चेहरे पर ग़म की ख़ुशी है।
गाँव में फिर एक किसान ने ख़ुदकुशी की है।
खेत उसका तो यू छोटा सा था।
पेट भरने में लेकिन कोई टोटा न था।
ट्रेक्टर, बैल और हल था ना उस के पास।
बच्चे बैल बनते और बीवी भी देती थी साथ।
पसीने से सींच कर फसल उगा लेता था वो।
मेहनत के भरोसे चार पैसे कम लेता था वो।
लेकिन दो साल से बारिश नहीं होई।
चुनाव थे न पास, सो सरकार सोई रही।
क़र्ज़ पर क़र्ज़, उस पर बढ़ता गया।
जिस्म और हड्डियों का वज़न घटाता गया।
चूका दो ब्याज नहीं तो, बेटी तुम्हारी बेच देंगे।
गुंडे लाला के, बीवी की इज्ज़त भी छेद देंगे।
सोच कर ये सब, उस ने अपनी हत्या करली।
मर गया तो क्या, घर की आबरू तो सलामत रखली।
(इमरान अली)
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
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जवाब देंहटाएंकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें
बहुत खूब, धन्यवाद
जवाब देंहटाएंvery nice...!!
जवाब देंहटाएंwelcome.....!!
Behad dard bharee rachna hai..Janta phirbhi khamosh hai...ham in hadson ke aadi jo ban gaye!
जवाब देंहटाएंKisanon kee badhaalee pe dil zarozaar rota hai..kaash ham milke kuchh kar payen!
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